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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verses 44–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

नष्टं नष्टमुपेक्षेत प्राप्तं प्राप्तमुपाहरेत् । निर्विकारतयैतद्धि परमार्चनमात्मनः ॥ ४४ ॥ सर्वदैव समग्रासु चेष्टानिष्टासु दृष्टिषु । परमं साम्यमाधाय नित्यात्मार्चाव्रतं चरेत् ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

अब मुख्य पूजा का सार बतलाते हैं। नष्ट पदार्थ तो नष्ट ही हे, अतः उसकी उपेक्षा करे यानी उसका सोच न करे | और प्राप्त पदार्थ प्राप्त ही हे, अतः उसका ग्रहण करे । महर्षे, निर्विकार होकर ऐसा करना ही आत्मदेव की पूजा है (यह तुम जानो)