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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

मनो मे द्वारपालोऽयं निवेदितजगत्त्रयः । चिन्तेयं मे प्रतीहारी द्वारस्था शुद्धरूपिणी ॥ २२ ॥ शक्तिर्ममात्मिका बुद्धिः क्रिया चैव वराङ्गना । ज्ञानानि च विचित्राणि भूषणान्यङ्गगानि मे ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसने तीनों लोक का वृत्तान्त विज्ञापित किया है, वह मन ही उक्त प्रकारके देवस्वरूप मेरा द्वारपाल यानी पहरेदार है ओर इस प्रकार बाह्मार्थविषयिणी चिन्ता ही द्वार पर स्थित सन्मात्रगोचर होने से शुद्धस्वरूपा अथवा परमविश्वसनीया मेरी अन्तःपुर पालिका है