Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
सर्वं विन्देत सुशुभं सर्वं विद्याऽच्छुभाशुभम् ।
सर्वमात्ममयं कुर्यान्नित्यात्मार्चाव्रतं चरेत् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण इष्ट एवं अनिष्ट पदार्थों में सर्वदा ही परम समानता का आश्रय कर निरन्तर
आत्म-पूजारूप व्रत करना चाहिए ॥ ४ ५॥ “यह जगत् ब्रह्मरूप ही है" इस दृष्टि से सब पदार्थ शुभ ही हैं,
यों जानना चाहिए । ब्रह्म संवलित मायारूपता की दृष्टि से तो सब शुभाशुभसंमिश्र है, यों जानना
चाहिए । इस प्रकार दोनों ही तरह से समता होने के कारण वैषम्यदर्शन का कोई कारण न होने से “यह
सब आत्ममय है अथवा आत्मप्रचुर है” यों भावना करनी चाहिए । इस प्रकार सदा आत्म-पूजारूप व्रत
का अनुष्ठान करना चाहिए