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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

ईश्वर उवाच । पावनं पावनानां यद्यत्सर्वतमसां क्षयः । तदिदानीं प्रवक्ष्येऽहमन्तःपूजनमात्मनः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी स्थिति में एक घड़ी ध्यान का राजसूय फल कहना कैसे युक्तिसंगत होगा ? क्योकि अश्वमेध फल की अपेक्षा राजसूय का फल कभी भी अधिक नहीं है । बृहदारण्यक के भुज्युप्रश्न मेँ (३।३।२) “क्र न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्रात्रिशतं वै देवरथाहनयान्ययं लोकः” (अश्वमेघ यज्ञ करनेवाले यजमान कहाँ जाते हैं ? (इस प्रकार भुज्यु के प्रश्न करने पर उनकी गति बतलाने की इच्छा से महर्षि याज्ञवल्क्य भुवन-कोश का परिमाण बतलाते हैँ ।) यह लोक बत्तीस देवरथाहनय-सूर्यरथ के अहोरात्र निरवच्छिन्न गमन से जितना देश नापा जा सकता है, वह एक देवरथाहनय है, उसके बत्तीस गुने परिमाण का है) इत्यादि श्रुति से पृथिवी, समुद्र आदि का परिमाण बतलाकर उसके बाद तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाशः* (व्यवहार में छुरे का अग्रभाग जितने परिमाण का होता है अथवा मक्खी का पंख जितने परिमाण का होता है, उतने ही परिमाण का ब्रह्माण्ड के कपालो की सन्धि में अवकाश है) इस श्रुति से ब्रह्माण्ड के दो कपालोँ की संधि बतलाकर "तानिन्द्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत्तान्वायुरात्मनि स्थित्वा तत्रागमयद्यत्राऽश्वमेधयाजिनोऽभवन्‌" (उन अश्वमेधयाजियों को इन्द्ररूप परमेश्वर ने पक्षी का रूप धारणकर वायु को समर्पित किया | पश्चात्‌ वायु ने उन्हें स्वात्मस्वरूप बनाकर वहाँ पहुँचाया, जहाँ पहले के अश्वमेधयाजी थे) इत्यादि श्रुति से अश्वमेधयाजियों को सूक्ष्म ब्रह्माण्डकपाल की संधि से वायु ने बाहर निकालकर समस्त कर्मफलों के उत्कर्षं से युक्त श्रेष्ठ स्थान में प्राप्ति कराई है, यह विरोध हो गया । इसी प्रकार श्रह्महत्याश्वमेधाभ्यां न परं पुण्यपापयोः“ (ब्रह्महत्या से बढ़कर कोई पाप नहीं ओर अश्वमेध से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है) यह भी प्रसिद्ध है । पूर्व रामायण के इलोपाख्यान में श्रीरामजी ने “नाऽश्वमेधात्‌ परो यज्ञः प्रियश्चैव महात्मनः“ (अश्वमेध से बढ़कर कोई दूसरा यज्ञ नहीं है ओर महात्माओं को भी उसे छोड़ दूसरा उनतालीसवाँ सर्ग प्राप्त हुए शब्द आदि विषयों से अंग-प्रत्यंगों के प्रकाशक प्रत्यगात्मस्वरूप शिव की अन्तःपूजा का वर्णन । ईश्वर ने कहा : महर्षे, जो पवित्र करनेवालों को भी पवित्र करनेवाला है तथा जो सम्पूर्ण अज्ञानों का नाश करनेवाला है, आत्मदेव का वह अन्तःपूजन अब मे आपसे कहता हू

सर्ग सन्दर्भ

अडइतीस्वौँ सर्ग समाप्त (2) शंका हो कि आधी घड़ी ध्यान करने से यदि हजार अश्वमेध का फल होता है, तो एक घड़ी ध्यान करने पर उससे अधिक फल बतलाना चाहिए ।