Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, verse 63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
देशकालकरणक्रमोदितैः सर्ववस्तुसुखदुःखविभ्रमैः ।
नित्यमर्चय शरीरनायकं तिष्ठ शान्तसकलेहया धिया ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
विस्तारपूर्वक कही गई बातों का ही संक्षेप कर उपसंहार करते है ।
महर्ष, देश, काल और करण के (पुरुष व्यापारो के) क्रमों से उत्पन्न सम्पूर्ण वस्तुओं के सुख-
दुःखात्मक विलासो से शरीर के अधिपति इस आत्मदेव की पूजा करो ओर जिससे सम्पूर्णं मनोरथ चले
गये हैं, ऐसी बुद्धि से उपलक्षित होकर स्थित हो जाओ (वही मुख्य शिव-पूजा है)