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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

षट्त्रिंशत्पदकोटिस्थमुन्मन्यन्तदशातिगम् । कुर्वन्तमन्तःशब्दादींश्चोदयन्तं मनःखगम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

जो शेवशास्त्र में प्रसिद्ध छत्तीस तत्त्वो के चरमस्थान में यानी अन्तिम कोटि में स्थित है; काली, रोद्री, कलविकरणी आदि शक्तियों के विभाग में मनोन्मनी-नामक शक्ति की अन्तदशा को भी जो लाँघ गया हे, अथवा शिवयोग में प्रसिद्ध सबीज समाधिरूप उन्मन्यन्त-दशा को जो पार कर गया है यानी जो निर्बीज समाधिरूप हे; जो भीतर शब्द आदि विषयों को उत्पन्न करता है और मनरूपी पक्षी को प्रेरित कर रहा है (उस बोधरूप लिंग की उपासना करनी चाहिए)