Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 126
एक सौ पचीसवाँ सर्ग समाप्त एक यौ छब्बीसवाँ सर्ग योगभूमिकाओं का अभ्यासक्रम तथा लक्षण, मध्य में मृत्यु हो जाने पर भोग एवं जन्मान्तर में जय आदि का वर्णन ।
41 verse-groups
- Verse 1“जाग्रत्येव सुषुप्तस्थः कुरुकमणि राघव“ (हे राघव, जाग्रत् काल में ही सुषुप्ति में स्थित-ज…
- Verse 2पूछे गये भूमिकाओं के अभ्यासक्रम को कहने की इच्छा रखनेवाले महाराज वसिष्ठजी उसका अधिकारी प्…
- Verse 3पहले रागादि दोषों के कारण विपरीत बुद्धिवाले कर्मो मे प्रवृत्त हुए पुरुष का लक्षण कहते है।…
- Verse 4निवृत्त पुरुष का लक्षण कहने की इच्छा रखते हुए महाराज वक्षिष्ठजी निवृत्ति में हेतुरूप विवे…
- Verses 5–6इसको किस तरह का विवेक उत्पन्न होता है, यह कहते हैं। अहो, संसार की यह व्यवस्था बिलकुल असार…
- Verses 7–11निवृत्त पुरुष की प्रथम भूमिका प्राप्ति का क्रम कहते हैं। मैं विरागी बनकर किस तरह संसारसाग…
- Verses 12–14इस तरह के गुणों से विशिष्ट पुरुष सतृशास्त्रश्रवणाधिकाररूप प्रथम भूमिका में अवतरित होता है…
- Verses 15–18वहाँ वह कया करता है, सो बतलाते हैँ । उस समय वह श्रुति, स्मृति, सदाचार, धारणा, ध्यान और कर…
- Verse 19इस तरह दूसरी भूमिका में पहुँचे हुए पुरुष का तीसरी भूमिका में प्रवेश बतलाते हैं। इसके अनन्…
- Verses 20–22अध्यात्मविषयक शास्त्रों के अद्वैत आत्मरूप वाक्यार्थ में (*अहं ब्रह्मास्मि" "तत्वमसि" इत्य…
- Verse 23चित्त के प्रसन्न होने पर व्युत्थानकाल में पूर्व की दो भूमिकाओं के धर्मो का अनुसरण भी अत्य…
- Verse 24'असंगता के सुख से सौम्य” इस उक्ति की विभाग कर व्याख्या करते हैं। तीसरी भूमिका में पहुँचकर…
- Verse 25यह असंग दो तरह का है - एक सामान्य (पूर्व भूमिका के समान साधारण) ओर दूसरा श्रेष्ठ । अपनी द…
- Verses 26–29इस तरह के निश्चय से दृश्य पदार्थों में संसक्त न होना ही सामान्य असंग कहा गया है। सुख या द…
- Verses 30–33पूर्व भूमिकाओं में सत्संग आदि उपायों से इसी असंग का भलीभाँति अभ्यास करना चाहिए, यह कहते ह…
- Verses 34–40न भीतर, न बाहर, न ऊपर, न नीचे, न दिशाओं में, न आकाश में, न पदार्थों में, न अपदार्थों में,…
- Verse 41यह समाधि सदाचार से उपवर्धित विवेक-ज्ञान का फल है, यह कहने के लिए विवेक का पद्मरूप से निरू…
- Verse 42उपायों के साथ वर्णित सफल तृतीय भूमिका का उपसंहार करते हैँ । हे श्रीरामचन्द्रजी, यही श्रेष…
- Verses 43–44प्रसंगवश, बीच में मूर्खो के ऊपर दया आ जाने से श्रीरामचन्द्रजी पूछते है। श्रीरामचन्द्रजी न…
- Verse 45पहले प्रश्न का उत्तर देते हैं। प्रवृद्ध रागादि दोषों वाले मूढ पुरुष को काकतालीययोग से यान…
- Verse 46वैराग्य उत्पन्न हो जाने पर प्रथम भूमिका का उदय प्राणी को अवश्य होता है और तदनन्तर उसका सं…
- Verses 47–51द्वितीय प्रश्न का उत्तर देते हैं। प्रथमादि भूमिकाओं में पहुँचकर अपना जीवन (देह) उत्सर्ग क…
- Verses 52–53दोनो प्रश्नों का उत्तर देकर अव प्रकृत का अनुसरण कर रहे हैं। हे श्रीरामजी, ये पूर्वोक्त ती…
- Verses 54–56उसी आर्द्रता का सबसे पहले लक्षण करते हैं। नित्यनैमित्तिक सब कामों को भलीभाँति करता हुआ तथ…
- Verses 57–61इस तीसरी भूमिका की प्राप्ति के बीच में ही मृत्यु को प्राप्त कर चुके निष्काम कर्मो के अनुष…
- Verses 62–69जो पुरुष पंचम भूमिका में पहुँच गया है, वह केवल चैतन्य सत्तारूप बनकर रह जाता है। सुषुप्तरू…
- Verses 70–73छठी भूमिका का लक्षण बतलाते हैं। जहाँ पर न तो सत्, न असत्, न अहंकार और न अहंकार का अभाव…
- Verses 74–82उत्तम वैराग्य होने पर ही भूमिकाओं में प्रवेश होता है, अन्यथा नहीं; इसका मदोन्मत्त हथिनी क…
- Verses 83–85"कथं निहन्यते चैषा“ (यह कैसे मारी जाती है) इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। अन्य सभी अस्त्रो…
- Verse 86तृष्णारूपी संसार का नाश ही मोक्षभूमिका के उदय में हेतु होने से मोक्ष है, भूमिकाओं के उदय…
- Verses 87–88राग आदि की उत्पत्ति न होने में तथा उत्पन्न हुए राग आदि के छेदन मे उपाय वतलाते है । एकमात्…
- Verses 89–90असंवेदन के स्वरूप का व्युत्पादन करते हैँ । सुन्दर असंवेदन में यानी उत्तमरूप से विषयों का…
- Verse 91कल्पनाओं के त्याग से ही मुक्ति होती है, यह आपने पहले अनेक बार कहा है, अव आप इच्छा के त्या…
- Verse 92संकल्प ही सम्पूर्ण अनर्थो का मूल है, यह जो पहले कहा गया है, उसका भी यही अभिप्राय है, यह इ…
- Verse 93अनुभूत ओर अननुभूत सब तरह की स्मृति का शीघ्र ही विस्मरण कर काष्ठ के समान मूढ एवं महामति हो…
- Verse 94सभी प्राणियों को विषय संकल्पो के त्याग के बिना मोक्ष की सिद्धि नहीं होती, इसलिए उनका त्या…
- Verse 95हे श्रीरामजी, यह श्रुतियों से (&) उक्त और लोक में भी प्रसिद्ध है कि सम्पूर्ण इन्द्रियो ओर…
- Verse 96सर्वथा संकल्पत्याग होने पर देहादि-स्पन्दन के अभाव से व्यवहार का लोप हो जाने पर कैसे जीवन…
- Verses 97–100हे श्रीरामजी, इस विषय में अधिक कहने की क्या आवश्यकता है ? संक्षेप से मैं इतना ही कहता हूँ…
- Verse 101चलिये
- Verse 102हे श्रीरामचन्द्रजी, अहं,” “मम” (यह मैं हूँ, यह मेरा है) यह भावना कर रहा पुरुष दुःख से छुट…