Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
प्रवृत्तश्च निवृत्तश्च भवति द्विविधः पुमान् ।
स्वर्गापवर्गोन्मुखयोः शृणु लक्षणमेतयोः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
पूछे गये भूमिकाओं के अभ्यासक्रम को कहने की इच्छा रखनेवाले महाराज वसिष्ठजी उसका
अधिकारी प्रवृत्तिशास्त्र के अधिकारी से भिन्न हैं, यो दिखलाने के लिए दोनों अधिकारियों का विभाग
करके उनके भिन्न-भिन्न लक्षण कहने की प्रतिज्ञा करते है ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे रामजी, वेदमार्ग में स्थित पुरुष दो तरह के होते हैं - एक प्रवृत्त
ओर दूसरा निवृत्त। (प्रवृत्तिमार्ग का पथिक स्वर्ग की अभिलाषा रखनेवाला तथा निवृत्तिमार्ग का पथिक
मोक्ष का अभिलाषी होता है ।) स्वर्ग ओर अपवर्ग की ओर उन्मुख हुए इन दोनों का लक्षण (मैं कहता हूँ)
आप सुनिये