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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 7–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verses 7–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 7-11

संस्कृत श्लोक

कथं विरागवान्भूत्वा संसाराब्धिं तराम्यहम् । एवंविचारणपरो यदा भवति सन्मतिः ॥ ७ ॥ विरागमुपयात्यन्तर्भावनास्वनुवासरम् । क्रियासूदाररूपासु क्रमते मोदतेऽन्वहम् ॥ ८ ॥ ग्राम्यासु जडचेष्टासु सततं विचिकित्सति । नोदाहरति मर्माणि पुण्यकर्माणि सेवते ॥ ९ ॥ मनोनुद्वेगकारीणि मृदुकर्माणि सेवते । पापाद्बिभेति सततं न च भोगमपेक्षते ॥ १० ॥ स्नेहप्रणयगर्भाणि पेशलान्युचितानि च । देशकालोपपन्नानि वचनान्यभिभाषते ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

निवृत्त पुरुष की प्रथम भूमिका प्राप्ति का क्रम कहते हैं। मैं विरागी बनकर किस तरह संसारसागर को तैर जाऊँ, इस तरह के विचार में तत्पर जब सद्बुद्धि प्राणी होता हे, तब भोग और उसके साधनों की चिन्ताओं में प्रतिदिन हृदय के अन्दर उसको नीरसता उत्पन्न होती है, चित्त शुद्धि के अनुकूल शौच, सत्संग, ईश्वरोपासना, जप आदिरूप क्रियाओं में वह पुरुष संसक्त होता है ओर प्रतिदिन चित्त शुद्धि की वृद्धि से तृष्णा का क्षय हो जाने के कारण वह प्रसन्न होता है । ग्राम्य जड चेष्टाओं मे वह निरन्तर घृणा करने लग जाता है, दूसरों के छिपे हुए दोषों का वह उद्घाटन नहीं करता ओर स्वयं पुण्य कर्मो का ही सेवन करता हे ।अपने तथा दूसरों के मन में उद्वेग न पहुँचानेवाले एवं थोड़े परिश्रम से महाफलवाले यम, नियम आदि कर्मो का वह सेवन करता है, पाप से सदा डरता है ओर भोगों में पाप अवश्य होने के कारण वह उनकी कभी अभिलाषा नहीं करता । वह स्नेह ओर प्रणय से पूर्ण, कोमल, सत्य, प्रिय ओर हितकारक तथा देश ओर काल के उपयुक्त वचन बोलता हे