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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 83–85

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verses 83–85 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 83-85

संस्कृत श्लोक

इत्यादिनिवहो नाम्नामस्यास्त्वाशयकोशगः । धैर्यनाम्ना वरास्त्रेण प्रसृतामवहेलया ॥ ८३ ॥ नागीं सर्वात्मिकामेतामिच्छां सर्वात्मना जयेत् । यावद्वस्त्विदमित्येवमियमन्तर्विजृम्भते ॥ ८४ ॥ तावदुग्रा कुसंसारमहाविषविषूचिका । एतावानेव संसार इदमस्त्विति यन्मनः ॥ ८५ ॥

हिन्दी अर्थ

"कथं निहन्यते चैषा“ (यह कैसे मारी जाती है) इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। अन्य सभी अस्त्रो का तिरस्कार कर धैर्यनामक सर्वश्रेष्ठ अस्त्र से बहुत दूर तक फैली हुई तथा सम्पूर्ण विषयों के साथ तादात्म्यभाव को प्राप्त हुई इस इच्छारूपी हथिनी को सब तरह से जीत लेना चाहिए । "यह वस्तु मुझे इस तरह प्राप्त हो जाय” यह इच्छा जब तक अन्तःकरण के भीतर विकसित रहती है तभी तक यह महाभयंकर कुत्सित संसाररूपी महाविष से उत्पन्न महामारी बनी रहती हे । “यह मुझे मिल जाय” यह जो संकल्प है, बस इतना ही संसार है तथा इसका शान्त हो जाना मोक्ष है, यही ज्ञानोपदेश-संग्रह है