Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 62–69
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verses 62–69 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 62-65
संस्कृत श्लोक
सत्तावशेष एवास्ते पञ्चमीं भूमिकां गतः ।
पञ्चमीं भूमिकामेत्य सुषुप्तपदनामिकाम् ॥ ६२ ॥
शान्ताशेषविशेषांशस्तिष्ठत्यद्वैतमात्रके ।
गलितद्वैतनिर्भासमुदितोऽन्तः प्रबुद्धवान् ॥ ६३ ॥
सुषुप्तघन एवास्ते पञ्चमीं भूमिकामितः ।
अन्तर्मुखतया तिष्ठन्बहिर्वृत्तिपरोऽपि सन् ॥ ६४ ॥
परिशान्ततया नित्यं निद्रालुरिव लक्ष्यते ।
कुर्वन्नभ्यासमेतस्यां भूमिकायां विवासनः ॥ ६५ ॥
षष्ठीं तुर्याभिधामन्यां क्रमात्क्रमति भूमिकाम् ।
यत्र नासन्न सद्रूपो नाहं नाप्यनहंकृतिः ॥ ६६ ॥
केवलं क्षीणमननमास्ते द्वैतैक्यनिर्गतः ।
निर्ग्रन्थिः शान्तसंदेहो जीवन्मुक्तो विभावनः ॥ ६७ ॥
अनिर्वाणोऽपि निर्वाणश्चित्रदीप इव स्थितः ।
अन्तःशून्यो बहिःशून्यशून्यः कुम्भ इवाम्बरे ॥ ६८ ॥
अन्तःपूर्णो बहिःपूर्णः पूर्णकुम्भ इवार्णवे ।
किंचिदेवैष संपन्नस्त्वथ वैष न किंचन ॥ ६९ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष पंचम भूमिका में पहुँच गया है, वह केवल चैतन्य सत्तारूप बनकर
रह जाता है। सुषुप्तरूप अमुख्य नाम से कही जा रही पंचम भूमिका प्राप्त कर पुरुष समस्त विकारांशों
से निर्मुक्त हो जाता है और अद्वैत परब्रह्मरूप तत्त्व में स्थित हो जाता है । जो पाँचवीं भूमिका में
पहुँच चुका है, वह द्वैतज्ञान से रहित होकर गाढ़ सुषुप्त के सदृश स्थित रहता है, उसका अपना
पूर्णस्वरूप प्रकाशित हो जाता है और भीतर से ज्ञानी रहता हे । पाँचवी भूमिका में स्थित पुरुष अन्तर्मुख
वृत्ति से रहता है। यद्यपि बाह्य व्यापार में तत्पर रहता है तथापि निरन्तर चारों ओर से शान्त होने के
कारण निद्रालु के सदुश दिखाई देता है। इस भूमिका में वासनाशून्य हो अभ्यास करता हुआ पुरुष
क्रमशः तुर्यनाम की अन्य छठी भूमिका में चला जाता हे