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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 97–100

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verses 97–100 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 97

संस्कृत श्लोक

बहुनात्र किमुक्तेन संक्षेपादिदमुच्यते । संकल्पनं परो बन्धस्तदभावो विमुक्तता ॥ ९७ ॥ सर्वमेवमजं शान्तमनन्तं ध्रुवमव्ययम् । पश्यन्भूतार्थचिद्रूपं शान्तमास्व यथासुखम् ॥ ९८ ॥ अवेदनं विदुर्योगं शान्तमासितमक्षयम् । योगस्थः कुरु कर्माणि निर्वासनोऽथ मा कुरु ॥ ९९ ॥ अवेदनं विदुर्योगं चित्तक्षयमकृत्रिमम् । अत्यन्तं तन्मयो भूत्वा तथा तिष्ठ यथासि भो ॥ १०० ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, इस विषय में अधिक कहने की क्या आवश्यकता है ? संक्षेप से मैं इतना ही कहता हूँ कि संकल्प ही सबसे बढ़कर बन्धन है और उसका न रहना ही मोक्ष है