Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
कियत्तन्नाम निर्वाणं वरं संसृतिरेव मे ।
इतिकर्तव्यकर्ता यः स प्रवृत्त इति स्मृतः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले रागादि दोषों के कारण विपरीत बुद्धिवाले कर्मो मे प्रवृत्त हुए पुरुष का लक्षण कहते है।
जो सम्पूर्ण विषयों से शून्य है, वह प्रसिद्ध निर्वाण पदार्थ चीज ही क्या है ? तात्पर्य यह कि भोगों मेँ
प्रम रखनेवाले पुरुष उसे कुछ नहीं समझते | थोड़ा-बहुत उत्तम या अधम भोगों से सम्पन्न यह संसार
ही मेरे लिए सबसे अच्छा है। (=) यों निश्चयकर वेदप्रतिपादित नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों को जो
करता है वह पुरुष प्रवृत्त कहा गया हे