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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 54–56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verses 54–56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 54-56

संस्कृत श्लोक

कर्तव्यमाचरन्काममकर्तव्यमनाचरन् । तिष्ठति प्राकृताचारो यः स आर्य इति स्मृतः ॥ ५४ ॥ यथाचारं यथाशास्त्रं यथाचित्तं यथास्थितम् । व्यवहारमुपादत्ते यः स आर्य इति स्मृतः ॥ ५५ ॥ प्रथमायामङ्कुरितं द्वितीयायां विकासितम् । फलीभूतं तृतीयायामार्यत्वं योगिनो भवेत् ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

उसी आर्द्रता का सबसे पहले लक्षण करते हैं। नित्यनैमित्तिक सब कामों को भलीभाँति करता हुआ तथा अकर्तव्यों को न करता हुआ जो प्राकृत आचार मेँ स्थित रहता है वह आर्य कहा गया है। अपने वृद्ध पुरुषों के आचारों के अनुसार, शास्त्रोक्त तथा चित्त को प्रसन्न रखनेवाले यथास्थित व्यवहारो का जो ग्रहण करता है वह आर्य कहा गया है । योगी का वही आर्यत्व शुभेच्छानामक प्रथम भूमिका में अंकुरित, द्वितीय भूमिका में श्रवण आदि के द्वारा विकास को प्राप्त तथा तृतीय भूमिका में चित्त की एकाग्रतारूप फल से फलित होता हे