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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 26–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verses 26–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 26-29

संस्कृत श्लोक

इत्यसञ्जनमर्थेषु सामान्यासङ्गनामकम् । प्राक्कर्मनिर्मितं सर्वमीश्वराधीनमेव च ॥ २६ ॥ सुखं वा यदि वा दुःख कैवात्र मम कर्तृता । भोगाभोगा महारोगाः संपदः परमापदः ॥ २७ ॥ वियोगायैव संयोगा आधयो व्याधयो धियः । कालः कवलनोद्युक्तः सर्वभावाननारतम् ॥ २८ ॥ अनास्थयेति भावानां यदभावनमान्तरम् । वाक्यार्थलग्नमनसः सामान्योऽसावसंगमः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह के निश्चय से दृश्य पदार्थों में संसक्त न होना ही सामान्य असंग कहा गया है। सुख या दुःख सब कुछ पूर्वकर्म से निर्मित और ईश्वर के अधीन है । इसमें मेरा कर्तृत्व कैसा ? ये विस्तृत भोग (विषय) अन्त में परितापी होने के कारण महारोग हैं तथा ये सारी सम्पत्तियाँ परम आपत्तियाँ हैं, क्योकि इनके उपार्जन ओर रक्षण के लिए मनुष्यों को नाना प्रकार के क्लेश सहने पडते हैँ । संयोग सब वियोग के लिए ही हैं और ये मानसिक चिन्ताएँ बुद्धि की व्याधियाँ हैं, सब पदार्थो को विनाश के गड्डे में ढकेल रहा काल तो उन्हे निगल जाने के लिए ही सदा प्रस्तुत रहता है । इस तरह अनास्था होने से "तत्त्वमसि" “अहं ब्रह्मास्मि" इत्यादि वाक्यार्थो में संलग्न चित्तवाले पुरुष की सम्पूर्ण पदार्थो में जो आन्तरिक अभावना है वही सामान्य असंग कहलाता है