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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 43–44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verses 43–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 43,44

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । मूढस्यासत्कुलोत्थस्य प्रवृत्तस्याधमस्य च । अप्राप्तयोगिसङ्गस्य कथमुत्तरणं भवेत् ॥ ४३ ॥ एकामथ द्वितीयां वा तृतीयां चेतरा च वा । आरूढस्य मृतस्याथ कीदृशी भगवन्गतिः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रसंगवश, बीच में मूर्खो के ऊपर दया आ जाने से श्रीरामचन्द्रजी पूछते है। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, असत्कुल में उत्पन्न, कामोपभोग के लिए प्रवृत्त, अधम तथा योगियों के संग को न प्राप्त किये हुए मूढ पुरुष का उद्धार कैसे होगा ? (&) हे भगवन्‌, पहली, दूसरी, (&) सत्कुल में उत्पन्न होना आदि जो वेदान्तशास्त्र के अधिकारियों के लक्षण हैँ उस सब विशेषणो से रहित, अध्यात्मशास्त्र की कथाओं से सदा विमुख रहनेवाले तथा कामोपभोग के लिए ही प्रवृत्तिमार्ग के पथिक बने हुए अधम पुरुषों को किसी दूसरे उपाय से मोक्ष हो सकता है या नहीं, यही इस प्रश्न का आशय है । तीसरी या अन्य किसी भूमिका में आरूढ़ होकर मर गये प्राणी की कैसी गति होती है ? यह कहिये