Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
मूढस्यारूढदोषस्य तावत्संसृतिरातता ।
यावज्जन्मान्तरशतैः काकतालीययोगतः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले प्रश्न का उत्तर देते हैं।
प्रवृद्ध रागादि दोषों वाले मूढ पुरुष को काकतालीययोग से यानी दैवगति से सैकड़ों जन्मों के
बाद जब तक अपने विचार से या साधुओं की संगति से वैराग्य उत्पन्न नहीं हो जाता, तब तक
उसका यह विस्तृत संसार रहता ही है