Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
द्विविधोऽयमसंसङ्गः सामान्यः श्रेष्ठ एव च ।
नाहं कर्ता न भोक्ता च न बाध्यो न च बाधकः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह असंग दो तरह का है - एक सामान्य (पूर्व भूमिका के समान
साधारण) ओर दूसरा श्रेष्ठ । अपनी देह की क्रियाओं का कर्ता तथा उन क्रियाओं के फलों का भोक्ता
मैं नहीं हूँ, क्योकि मैं निष्क्रिय तथा नित्यतृप्त हूँ। दूसरों की क्रियाओं तथा उनके फलों का भी मैं बाध्य
और बाधक नहीं हूँ, क्योकि व्यापारशून्य हूँ