Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 30–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verses 30–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 30-33
संस्कृत श्लोक
अनेकक्रमयोगेन संयोगेन महात्मनाम् ।
वियोगेनासतामन्तः प्रयोगेणात्मसंविदाम् ॥ ३० ॥
पौरुषेण प्रयत्नेन संतताभ्यासयोगतः ।
करामलकवद्वस्तुन्यागते स्फुटतां दृढम् ॥ ३१ ॥
संसाराम्बुनिधेः पारे सारे परमकारणे ।
नाहं कर्तेश्वरः कर्ता कर्म वा प्राकृतं मम ॥ ३२ ॥
कृत्वा दूरतरे नूनमिति शब्दार्थभावनम् ।
यन्मौनमासनं शान्तं तच्छ्रेष्ठासङ्ग उच्यते ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्व भूमिकाओं में सत्संग आदि उपायों से इसी असंग का भलीभाँति अभ्यास करना चाहिए, यह
कहते हैं।
इसी पूर्वोक्त अभ्यासयोग से, महात्माओं की संगति, दुर्जनों की असंगति से, श्रवण-मननात्मक
आत्मविचारों के अन्तःकरण में प्रयोग से (आवर्तन से) (5) तथा लगातार अभ्यासयोग द्वारा अपने
पुरुष प्रयत्न से संसारसागर के पार, सबके सार, परमकारणभूत आत्मतत्त्व के - प्रमाण और प्रमेय
की असंभावना के निरास द्वारा हस्तामलकवत् दृढ़रूप से खूब स्पष्ट हो जाने पर यानी ठीक ऐसा
ही आत्मवस्तु है, इस विश्वास का विषय हो जाने पर मैं कर्ता नहीं हूँ, किंतु ईश्वर ही कर्ता है; पूर्व
जन्म में किया गया या वर्तमानकाल में किया जा रहा मेरा कोई कर्म नहीं है इत्यादि अभाव और उसके
प्रतियोगी आदि के विषय में विकल्प करनेवाली शब्दार्थ भावना को भी बहुत दूर फेंककर जो शान्त
मौनरूप से रहना है वही श्रेष्ठ असंग कहलाता हे