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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 34–40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verses 34–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 34,35

संस्कृत श्लोक

यन्नान्तर्न बहिर्नाधो नोर्ध्वं नाशासु नाम्बरे । न पदार्थे नापदार्थे न जडे न च चेतने ॥ ३४ ॥ आसितं भासनं शान्तमभासं नभसा समम् । अनाद्यन्तमजं कान्तं तच्छ्रेष्ठासङ्ग उच्यते ॥ ३५ ॥ संतोषामोदमधुरः सत्कार्यामलपल्लवः । चित्तनालाग्रसंलीनो विघ्नकण्टकसंकटः ॥ ३६ ॥ विवेकपद्मो रूढोऽन्तर्विचारार्कविलासितः । फलं फलत्यसंसङ्गां तृतीयां भूमिकामिमाम् ॥ ३७ ॥ समवायाद्विशुद्धानां संचयात्पुण्यकर्मणाम् । काकतालीययोगेन प्रथमोदेति भूमिका ॥ ३८ ॥ भूमिः प्रोदितमात्रा तैरमृताङ्कुरिकेव सा । विवेकेनाम्बुसेकेन रक्ष्या पाल्या प्रयत्नतः ॥ ३९ ॥ येनांशेनोल्लसत्येषा विचारेणोदयं नयेत् । तमेवानुदिनं यत्नात्कृषीवल इवाङ्कुरम् ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

न भीतर, न बाहर, न ऊपर, न नीचे, न दिशाओं में, न आकाश में, न पदार्थों में, न अपदार्थों में, न जड़ में और न चिदाभास में यानी बाहर या भीतर आदि सभी वस्तुओं में आलम्बनशून्य होकर स्थित जो स्वप्रकाशचिद्रूप, शान्त, अन्यप्रकाशक से शून्य आकाश के समान स्वच्छ, एकरस और गम्भीर, आदि - अन्त से रहित तथा (८) देखिये भगवान्‌ बादरायण का सूत्र : “आवृत्तिरसकृदुपदेशात्‌। जो अत्यन्त कान्त ब्रह्म है वही श्रेष्ठ असंग कहा जाता है