Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 74–82
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, verses 74–82 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 74-82
संस्कृत श्लोक
आसामभ्यासयोगेन न दुःखमनुभूयते ।
अस्त्यत्यन्तमदोन्मत्ता मृदुमन्थरचारिणी ॥ ७४ ॥
करिणी विग्रहव्यग्रा महादशनशंसिनी ।
सा चेन्निहन्यते नूनमनन्तानर्थकारिणी ॥ ७५ ॥
तदेतासु समग्रासु भूमिकासु नरो जयी ।
करिणी मदमत्ता सा यावन्न विजितौजसा ॥ ७६ ॥
को नाम सुभटस्तावत्संपत्समरभूमिषु ।
श्रीराम उवाच ।
कासौ प्रमत्ता करिणी काश्च ता रणभूमयः ॥ ७७ ॥
कथं निहन्यते चैषा क्व चैषा रमते चिरम् ।
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
रामेच्छा नाम करिणी इदं मेऽस्त्वितिरूपिणी ॥ ७८ ॥
शरीरकानने मत्ता विविधोल्लासकारिणी ।
मत्तेन्द्रियोग्रकलभा रसनाकलभाषिणी ॥ ७९ ॥
मनोगहनसंलीना कर्मदन्तद्वयान्विता ।
मदोऽस्या वासनाव्यूहः सर्वतः प्रसरद्वपुः ॥ ८० ॥
संसारदृष्टयो राम तस्याः समरभूमयः ।
भूयो यत्रानुभवति नरो जयपराजयौ ॥ ८१ ॥
इच्छानागी निहन्त्येषा कृपणाञ्जीवसंचयान् ।
वासनेहा मनश्चित्तं संकल्पो भावनं स्पृहा ॥ ८२ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्तम वैराग्य होने पर ही भूमिकाओं में प्रवेश होता है, अन्यथा नहीं; इसका मदोन्मत्त हथिनी की
आख्यायिका के बहाने वर्णन करते हैं।
धीरे-धीरे खूब झूम-झूमकर चलनेवाली, अत्यन्त मदोन्मत्त, लड़ाई करने में सदा तत्पर, अपने
बड़े-बड़े दाँतों से प्रख्याति को प्राप्त कर चुकी तथा अत्यन्त अनर्थ को पैदा करनेवाली एक हथिनी है।
यदि वह किसी तरह मार दी जाती है, तो इन समस्त भूमिकाओं में मनुष्य विजयी बन सकता है। वह
मदोन्मत्त हथिनी जब तक पराक्रम से जीत नहीं ली जाती, तब तक कौन ऐसा वीर है जो उससे आक्रान्त
क्षुद्र सांसारिक सम्पत्तिरूपी युद्ध भूमियों में प्रवेश करने के लिए भी समर्थ हो सकता है ? श्रीरामचन्द्रजी
ने कहा : हे भगवन्, वह कौन प्रमत्त हथिनी है, वे युद्ध भूमियाँ कौन हैं, कैसे यह मारी जाती है तथा कहाँ
यह चिरकाल तक रमण करती है। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, मुझे यह मिल जाय, ऐसी
जो इच्छा है उसीका नाम हथिनी है, वह शरीररूपी जंगल में रहती है और मत्त होकर अनेक तरह के
शोक, मोह आदि उल्लासो को पैदा करने में तत्पर रहती है। मतवाले इन्द्रियों के समूह ही उसके उग्र
प्रकृति के बच्चे हैं, वह जीभ से मनोहर भाषण करती है, शुभाशुभ कर्मरूपी दो दाँतों से युक्त वह
मनरूपी गहन स्थान में लीन रहती है । चारों ओर दूर तक फैल रहे शरीर से युक्त वासनाओं का समूह
ही इस हथिनी का मद है और हे श्रीरामजी, संसारदृष्टियाँ इसकी युद्ध भूमियाँ हैं। यहाँ पर पुरुष बार-
बार जय और पराजय का अनुभव करता है। यह इच्छा नामवाली हथिनी कृपण प्राणि समूहों को मारती
(&) यानी वह योगियों के मानस अनुभव से ही एकमात्र गम्य है । जीवित ज्ञानी पुरुष के लिए
यदि सातवीं भूमिका ही नहीं है, तो फिर वह योगियों के मानस अनुभव से गम्य कैसे होगी, ऐसा किसी
को भ्रम न करना चाहिए, क्योकि “सा सीमा भवभूमिषु" इत्यादि से उसमें संसार की भूमियों की
सीमारूपता जो बतलाई गयी है, उससे विरोध होने लगेगा तथा “आसामभ्यासयोगेन' इत्यादि उत्तरोत्तर
भूमिकाओं के अभ्यास का जो निर्देश किया गया है, उससे भी विरोध होने लगेगा ।
है। वासना, चेष्टा, मन, चित्त, संकल्प, भावना ओर स्पृहा इत्यादि इसके नामों का समूह है, यह समूह
चित्तरूपी कोश के अन्दर रहता है