Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 61
साठवाँ सर्ग समाप्त डुकसठवाँ सर्ग अद्वितीय पर ब्रह्म में स्वाभाविक चित्तैकाग्रयात्मक समाधि के स्वरूप के ज्ञान के लिए सुरघु और परिघ के संवाद का वर्णन ।
37 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : कमल के समान नेत्रोंवाले हे राघव, राजा सुरघु के समान आप भी हर्ष, शोक…
- Verse 2जैसे घोर अन्धकार मे बैठा हुआ बालक प्रकाश को प्राप्त कर खिन्न नहीं होता, वैसे ही गाढ़ अज्ञ…
- Verse 3जैसे कुएँ में गिर रहे प्राणी को मजबूत तृणसमुदाय के अवलम्बन से विश्रान्ति-सुख मिलता है, वै…
- Verse 4हे श्रीरामजी, आपने समस्त भूमण्डल को सुशोभित किया हे । अब आप इस परम पवित्र दृष्टि को बार-ब…
- Verse 5श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ, जैसे वायु के द्वारा हिलाया गया मोर का पंख अत्यन्त च…
- Verse 6श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, जिस समय सुरघु आत्मसाक्षात्कार कर लेने के अनन्तर प्रबुद्ध हो च…
- Verse 7उनका परस्पर का सुन्दर संवाद आपसे कहता हूँ
- Verse 8रथ के अक्ष-दण्ड की (धुरे की) नाई आधारभूत अथवा रथ में परिघ नामक शस्त्र शत्रुदल के शूर-वीरो…
- Verses 9–14हे रघुनंदन, जैसे नन्दनवन में रहनेवाले कामदेव का वसन्तमित्र है, वैसे राजा परिघ सुरघु का पर…
- Verse 15जिसकी बुद्धि शान्त हो चुकी थी तथा जिसने अपना दमन किया था, ऐसा पर्वत के गुहा मन्दिर में तप…
- Verse 16बहुत काल तक उसने अग्नि की नाई केवल सुखे पत्तों का ही भक्षण किया, इसलिए बड़े-बड़े तपस्वियो…
- Verse 17तभी से लेकर जम्बूद्वीप में पर्णाद नाम का यह उत्तम राजर्षि मुनियों के मण्डल में अत्यन्त वि…
- Verses 18–19तदनन्तर एक हजार वर्ष की दारूण तपश्चर्या से अभ्यासवश अन्तःकरण की परमशुद्धि तथा ईश्वर के अन…
- Verse 20हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे हंसों के साथ भ्रमर कमलिनी में विहार करते हैं वैसे ही यहाँ जिर्ण…
- Verse 21किसी समय यत्र-तत्र विचर रहे राजर्षि पर्णाद उस स्वर्णजट नामक, देश के अधिपति राजा सुरघु के…
- Verses 22–24पहले से ही वे मित्र थे, वहाँ उन्होने परस्पर एक दूसरे का पूजन किया । वे पूर्ण थे, दोनों ही…
- Verse 25परिघ ने कहा : हे सुरघो, आपके दर्शन से मेरा चित्त अत्यन्त आनन्द को प्राप्त हुआ और चन्द्रबि…
- Verse 26तालाब के किनारे पर अवस्थित छिन्न आशावाले वृक्ष के समान सहज आनन्द का समर्पण करनेवाला स्वाभ…
- Verse 27साधो, विश्वास गर्भित उन पहले की सुखदुःख की कथाओं, लीलाओं तथा व्यापारो का बार-बार स्मरण कर…
- Verse 28राजन्, जैसे आपने महामुनि माण्डव्य के प्रकाश से परम तत्त्व जाना वैसे ही मैंने तप से आराधि…
- Verse 29महाराज, क्या आप समस्त दुःखों से छुटकारा पा चुके हैं ओर जैसे कोई भूमण्डल का स्वामी उत्तरोत…
- Verses 30–31हे परमकल्याण, जैसे शरत्-काल में तालाब के जल में धूल आदि का आवरण न होने के कारण उसमें प्र…
- Verse 32हे सौभाग्यसम्पनन राजन्, सुप्रसन्न एवं गंभीर समदुष्टि से क्या आप समस्त जनों के हित के साध…
- Verse 33महाराज, उत्कृष्ट सस्यआदि फलों से सम्पन्न, विविधफलों से विनम्र कल्पलता की नाई पृथिवी क्या…
- Verse 34राजन्, चन्द्रमा की अनेक किरणों की नाई समस्त दिशाओं में तुषार के समूह के सदुश आपका क्या प…
- Verse 35महात्मन्, जैसे तालाब का जल अपने अन्दर रहने वाली कमल के नाल की भूमि को भर देता हे, वैसे ह…
- Verses 36–37क्या धान की क्यारियों के कोने में अवस्थित अतिप्रसन्न कुमारियाँ प्रत्येक गाँव में आपके आनन…
- Verse 38शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं से रहित यह आपकी देहरूपी लता एेहिक फल के साधनरूप से विहित का शरी…
- Verse 39हे जितेन्द्रिय, ऊपर-ऊपर से रमणीय दिखाई देनेवाले, पर असलियत में आत्मतत्त्व में भारी प्रतिब…
- Verse 40अहो, अपने दोनों को एक दूसरे से अलग हुए बहुत काल व्यतीत हुआ, परन्तु वसन्त ऋतु और पर्वततट क…
- Verse 41प्रियवर, इस जगदीतल में इष्ट ओर अनिष्ट जनों के संयोग एवं वियोग से होने वाली वे सुख और दुःख…
- Verse 42वियोगी थे, परन्तु फिर भी इस समय हम लोग एक दूसरे से मिल गये हैं, क्योकि प्राणियों के कर्मो…
- Verse 43परिध द्वारा कहे गये अर्थ का अनुमोदन करते हुए युरघु उसी अर्थ को कहते हैं। सुरघु ने कहा : भ…
- Verse 44प्रियवर, विधि ने इस प्रकार आप ओर हमलोग दोनों को देशतः अत्यन्त दूर तथा कालतः भी अधिक समय त…
- Verses 45–46महात्मन्, आज तो हम लोग अत्यन्त सुखी होकर अवस्थित हैं, आपके आगमनरूपी पुण्यो से हम अत्यन्त…
- Verse 47राजर्षि, नगर में अवस्थित हम लोगों की सम्पूर्ण सम्पत्तियाँ आज आपके शुभागमन से चारों ओर फलो…
- Verse 48हे महानुभाव, आपके पुण्य वचन ओर दर्शन चारों ओर से मानों अमृतां की मधुर राशि बरसा रहे हैं,…