Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 61, Verses 9–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 61, verses 9–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 9-14
संस्कृत श्लोक
स बभूव परं मित्रं सुरघो रघुनन्दन ।
नन्दनोद्यानसंस्थस्य मदनस्येव माधवः ॥ ९ ॥
कदाचित्परिघस्याभूदवर्षं मण्डले महत् ।
कल्पान्त इव संसारे प्रजादुष्कृतदोषजम् ॥ १० ॥
विनेशुर्जनतास्तत्र बह्वयः क्षुत्क्षामजीविताः ।
ज्वलिते विपिने वह्नौ यथा भूतपरम्पराः ॥ ११ ॥
तद्दुःखं परिघो दृष्ट्वा विषादमतुलं ययौ ।
तत्याजाश्वखिलं राज्यं दग्धं ग्राममिवाध्वगः ॥ १२ ॥
प्रजानाशप्रतीकारेष्वसमर्थो विरागवान् ।
जगाम विपिने कर्तुं तपोऽजिनमुनीन्द्रवत् ॥ १३ ॥
पौराणामपरिज्ञाते कस्मिंश्चिद्दूरकानने ।
समुवास विरक्तात्मा लोकान्तर इवापरे ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रघुनंदन, जैसे नन्दनवन में रहनेवाले कामदेव का वसन्तमित्र
है, वैसे राजा परिघ सुरघु का परम मित्र था किसी समय जैसे प्रलयकाल के प्राप्त होने पर संसार में
बड़ी भारी अनावृष्टि होती है, वैसे ही इस राजा के राष्ट्र में बड़ी भारी अनावृष्टि (वर्षा का अभाव) हुई ।
उसमें कारण राजा का दोष नहीं था, किन्तु कारण था ~ प्रजाओं का पापरूपी दोष । जंगल में प्रज्वलित
अग्नि में जैसे प्राणियों की पंक्ति-की-पंक्तियाँ नष्ट भ्रष्ट हो जाती हैं, वैसे ही अनावृष्टि से वहाँ की
बहुत सी जनता क्षुधा से गतप्राण होकर नष्ट भ्रष्ट हो गई । प्रजा का कष्ट देखकर राजा परिघ अपार
विषाद से ग्रस्त हुआ । जैसे बटोही जले गाँव को छोड़ देता है, वैसे ही उसने अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक
अपना सारा राज्य छोड दिया । प्रजा जनों को विनाश से बचाने के लिए उसने अनेक उपाय किये, उन्हें
कुछ भी लाभ नहीं हुआ, अतः अपने राज्यसे विरक्त होकर मृगचर्मधारी बड़े बड़ मुनियों की नाई अरण्य
में तप करने के लिए चला गया । जिसे नागरिक नहीं जानते थे, ऐसे किसी दूर अरण्य में विरक्तात्मा
होकर ऐसे रहने लगा जैसे दूसरे परलोक मेँ रहता हो