Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 61, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 61, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
कथमेकसमाधानं कीदृशं वा मुनीश्वर ।
वाताहतमयूराङ्गरुहलोलं मनो भवेत् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ, जैसे वायु के द्वारा हिलाया गया मोर का पंख अत्यन्त चपल
होता हे, वैसे ही यह मन अति चपल है, अतः भला बतलाइये कि यह अति चंचल मन किस तरह और
किस रूप से एक वस्तु में स्थिर रह सकता है ?