Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 61, Verses 22–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 61, verses 22–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 22-24
संस्कृत श्लोक
ते तत्र प्राक्तने मित्रे पूजामकुरुतां मिथः ।
पूर्णौ विज्ञातविज्ञेयौ मौर्ख्यगर्भाद्विनिर्गतौ ॥ २२ ॥
अहो नु बत कल्याणैः फलितं मम पावनैः ।
संप्राप्तवानहं यत्त्वामित्यन्योन्यमथोचतुः ॥ २३ ॥
आलिङ्गितशरीरौ तावन्योन्यानन्दिताकृती ।
एकासने विविशतुश्चन्द्रार्काविव भूधरे ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले से ही वे मित्र थे, वहाँ उन्होने परस्पर एक दूसरे का
पूजन किया । वे पूर्ण थे, दोनों ही ज्ञातव्य तत्त्व जान चुके थे संसार से परे यानी जीवन्मुक्त हो गये थे ।
अनन्तर उन दोनों ने एक दूसरे से यह कहा : अहो, निश्चित मेरे कल्याणमय पावन सत्कर्मो का यह फल
है, जो कि मैंने आपको पाया । एक दूसरे का शरीर से आलिंगन कर परस्पर आनन्दित आकृतिवालेवे
दोनों एक पर्वत के ऊपर चन्द्र ओर सूर्य की नाई एक आसन पर बैठे