Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 5
चौथा सर्ग समाप्त पाँचवाँ सर्ग अविवेक से बढ़ी हुई मनोमात्ररूपी जगत-सृष्टि की निवृत्ति के उपाय का क्रम ।
31 verse-groups
- Verses 1–3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे मनोहर आकृतिवाले श्रीरामचन्द्रजी , उत्तम सिद्धान्तं से सुन्दर, मो…
- Verse 4किस उपाय से उसका त्याग करते हैं, ऐसे प्रश्न होने पर उस उपाय को कहते हैं। हे साधो, शुद्धसा…
- Verse 5शास्त्र के अभ्यास, सज्जनो की संगति और सत्कर्मो के आचरण से जिनके पाप नष्ट हो चुके, ऐसे महा…
- Verse 6स्वयं ही विचार द्वारा अपने-आप अपने स्वरूप का विचार कर जब तक ज्ञान नहीं होता, तब तक ज्ञातव…
- Verse 7आप में तो उसकी प्राप्ति की योग्यता है ही, ऐसा कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञानवान्, प…
- Verses 8–10हे प्रज्ञ, संसाररूपी कार्यो में क्या वस्तु सत्य है अथवा क्या असत्य है, इस बात का निरीक्षण…
- Verse 11मनोरथ से बनाए गये महल के तुल्य यह जगत एकमात्र मन का कार्य है, इस कारण भी इसमें सत्यत्व प्…
- Verses 12–13श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्राह्यन्, यह बात मुझे ज्ञात हो गई है कि इस त्रिभुवन में मन…
- Verses 14–15पहले शास्त्राभ्यास ओर सज्जनसंगति से वैराग्य आदि साधन चतुष्टय का सम्पादन करना चाहिए, ऐसा क…
- Verses 16–17तदुपरान्त गुरु द्वारा उपदिष्ट मार्ग से पहले त्रिलोचन आदि सगुण परमेश्वर का ध्यान, भजन आदि…
- Verse 18तब तक पुरुष संसाररूपी महासागर में तृण के समान बहता है, जब तक कि बुद्धिरूपी नाव से विचाररू…
- Verse 19विचार से जिसने ज्ञातव्य वस्तु को जान लिया, उस पुरुष की बुद्धि जैसे स्थिर जल रेत के कणों क…
- Verses 20–21राख में छिपे हुए सोने को यद्यपि और लोग अलग नहीं कर सकते; तथापि सदा सुवर्ण का शोधन करने से…
- Verse 22जिस पुरुष ने तत्त्व वस्तु का ज्ञान प्राप्त नहीं किया, उसका मन यदि मोह को प्राप्त होता है…
- Verse 23हे जनों, अपरिज्ञात (जिसका परिज्ञान नहीं हुआ) आत्मा आप लोगों की दुःखसिद्धि के लिए हैं, क्य…
- Verses 24–25जिसने आत्मा का तिरोधान कर रक्खा है, ऐसे इस शरीर से मिले-जुले हुए से अपने अपने आत्मा का पं…
- Verse 26शंका : विपुल जल के कमल के पत्ते में विन्दुरूप से आरूढ होने ओर परिच्छेद आदि में वायु आदि न…
- Verses 27–40दुर्वासनारूपी पंकपूर्ण, गर्त में कछुए के समान छिपा हुआ ओर कठोर, भोग प्राप्ति में मार्ग के…
- Verse 41वास्तव में तो भान्ति का भी पथक् निरूपण नहीं किया जा सकता, ब्रह्मैवेदं सर्वमात्मैवेदं सर्…
- Verses 42–43अब पूर्वोक्ति आत्मा के परिचय से उसमें विश्राम पाने के लिए सदा उसकी भावना करना चाहिये, ऐसा…
- Verse 44आत्मभावापन्न पुरुष की जीवन्मुक्तिरूप विश्रान्ति दिखलाते हैं। ॐ आँखें आधी बन्द करके सूर्य…
- Verse 45हे श्रीरामचन्द्रजी, आप सर्वत्र सम, अपने स्वरूप में स्थित, स्थिर बुद्धि, शोकरहित मनवाले मु…
- Verse 46हे श्रीरामचन्द्रजी, आप अविद्या ओर उसके कार्यो से विशुद्ध (अविद्या ओर अविद्या के कार्य से…
- Verse 47हे श्रीरामचन्द्रजी, आप विषयों के राग से रहित, क्लेशशून्य; निर्मल, निष्पाप, न ग्रहण करनेवा…
- Verse 48हे श्रीरामचन्द्रजी, आप संसारातीत पद को प्राप्त हुए, प्राप्तव्य वस्तु के प्राप्त होने से प…
- Verse 49हे श्रीरामचन्द्रजी, आप विकल्पों की परम्पराओं से रहित, मायारूपी काजल से शून्य, अपने से अपन…
- Verse 50हे आत्मवेत्ताओं में भ्रष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, आप संसार से भी विशाल शरीरवाले (सर्वव्यापक), प…
- Verse 51हे श्रीरामचन्द्रजी, जो कुछ मिल गया उसका भोग करने, सभी जगह अभिलाषा न करने तथा त्याग ओर ग्र…
- Verse 52पूर्ण सागर के समान अपने से ही अपने में पूर्णकामता का सेवन कीजिये । पूर्ण चन्द्रमण्डल के स…
- Verse 53हे श्रीरामचन्द्रजी, यह सारी प्रपंच रचना असत्य है । यह असत्य है, ऐसा जाननेवाला तत्त्वज्ञ प…
- Verse 54यदि तत्त्वज्ञ पुरुष असत्य वस्तु का अनुसरण नहीं करता है, तो राज्य आदि से मेरा क्या प्रयोजन…