Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
जायते मन एवेह मन एव विवर्धते ।
सम्यग्दर्शनदृष्ट्या तु मन एव हि मुच्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
मनोरथ से बनाए गये महल के तुल्य यह जगत एकमात्र मन का कार्य है, इस कारण भी इसमें
सत्यत्व प्रसंग नहीं हो सकता, इस आशय से कहते हैं।
मन ही यहाँ पर जन्म लेता है, मन ही बढ़ता है और तत्त्वदर्शन से मन ही मुक्त होता है