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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verses 20–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

इदं रुक्ममिदं भस्म परिज्ञातमिति स्फुटम् । न यथा हेमकारस्य हेमज्ञानात्मनस्तथा ॥ २० ॥ अक्षयोऽयं मनागात्मा स्वात्मन्यवगते चिरम् । भवतीति नरस्येह मोहस्यावसरः कुतः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

राख में छिपे हुए सोने को यद्यपि और लोग अलग नहीं कर सकते; तथापि सदा सुवर्ण का शोधन करने से उसे पृथक्‌ करने में दक्ष स्वर्णकार को यह सोना है, यह भस्म है, यह जैसे साफ ज्ञात हो जाता है, उसके न मिलने से होनेवाला मोह उसे नहीं होता वैसे ही अज्ञानियों की दृष्टि से परिच्छिन्न यह जीव चिरकाल तक विचार द्वारा विवेक करके अपने स्वरूप का परिज्ञान कर लेने पर स्वतः कालादिपरिच्छेद शून्य हो जाता है, इसलिए मनुष्य को इसमें मोह का अवसर ही कहाँ ?