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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

अपरिज्ञातसारे हि मनोऽन्तर्यदि मुह्यते । ज्ञातसारे त्वसंदिग्धमसती किल मूढता ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस पुरुष ने तत्त्व वस्तु का ज्ञान प्राप्त नहीं किया, उसका मन यदि मोह को प्राप्त होता है तो हो, किन्तु जिसे सार पदार्थ का परिज्ञान हो चुका है, उसकी मूढता सम्भावित नहीं है, इसमें कोई संदेह नहीं है