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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verses 8–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

स्वयमालोकय प्राज्ञ संसारारम्भदृष्टिषु । किं सत्यं किमसत्यं वा भव सत्यपरायणः ॥ ८ ॥ आदावन्ते च यन्नास्ति कीदृशी तस्य सत्यता । आदावन्ते च यन्नित्यं तत्सत्यं नाम नेतरत् ॥ ९ ॥ आद्यन्तासन्मये यस्य वस्तुन्यासज्जते मनः । तस्य मुग्धपशोर्जन्तोर्विवेकः केन जन्यते ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

हे प्रज्ञ, संसाररूपी कार्यो में क्या वस्तु सत्य है अथवा क्या असत्य है, इस बात का निरीक्षण विचार से स्वयं कीजिए और सत्यपरायण होइए। जो वस्तु आदि और अन्त में नहीं है, उसकी सत्यता कैसी ? जो वस्तु आदि और अन्त में नित्य है, वही सत्य है, वह उससे अतिरिक्त असत्य स्वभाव कैसे हो सकती है, क्योकि स्वभाव का विपर्यय नहीं हो सकता । जिसका मन आदि और अन्त में असन्मय वस्तु में सत्यबुद्धि से अनुरक्त है, उस मूढ पशुरूप जन्तु को विवेक किस उपाय से उत्पन्न किया जा सकता है ?