Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verses 24–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 24,25
संस्कृत श्लोक
मिश्रीभूतमिवानेन देहेनोपहतात्मना ।
व्यक्तीकृत्य स्वमात्मानं स्वस्था भवत मा चिरम् ॥ २४ ॥
देहेनास्य न संबन्धो मनागेवामलात्मनः ।
हेम्नः पङ्कलवेनेव तद्गतस्यापि मानवाः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसने आत्मा का तिरोधान कर रक्खा है, ऐसे इस शरीर से मिले-जुले हुए से अपने अपने आत्मा
का पंच कोशो के विवेक द्वारा साक्षात्कार कर आप लोग शीघ्र स्वस्थ होइये । हे लोगों, जैसे कीचड़ में
गिरे हुए सोने का कीचड़ के साथ तनिक भी सम्बन्ध नहीं रहता वैसे ही इस निर्मल आत्मा का देह के
साथ तनिक भी सम्बन्ध नहीं हे । जैसे कमलो के आधारभूत विपुल जल और कमल के पत्ते में स्थित
जल की वदे उपाधि से ही भिन्न हैं; वस्तुतः उनमें भेद नहीं है वैसे ही ब्रह्म ओर जीव उपाधिवश ही
पृथक्-पृथक् हैं