Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
ज्ञातमेतन्मया ब्रह्मन्यथास्मिन्भुवनत्रये ।
मन एव हि संसारिजरामरणभाजनम् ॥ १२ ॥
यस्तस्योत्तरणोपायस्तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ।
हार्दं तमस्त्वयार्केण राघवाणां विनाश्यते ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्राह्यन्, यह बात मुझे ज्ञात हो गई है कि इस त्रिभुवन में मन ही जरा,
मरण का भाजन संसारी है, उसके तरने का जो सुनिश्चित उपाय है, उसे मुझसे कहिये । क्योकि
रघुवंशियों के हृदय के अज्ञानान्धकार का सूर्यरूप आप विनाश करते हैं