Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
तावद्भवमहाम्भोधौ जनस्तृणवदुह्यते ।
विचारतटविश्रान्तिमेति यावन्न चेतसा ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तक पुरुष संसाररूपी महासागर में तृण के समान बहता है, जब तक कि बुद्धिरूपी नाव से विचाररूपी
तट पर स्थिर नहीं हो जाता