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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verses 42–43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

भावयन्नात्मनात्मानं चिद्रूपेणैव चिन्मयम् । ऋजूज्ज्वलमये ह्यात्मा स्वयमात्मनि जृम्भते ॥ ४२ ॥ न शोकोस्ति न मोहोस्ति न जन्मास्ति न जन्मवान् । यदस्तीह तदेवास्ति विज्वरो भव राघव ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

अब पूर्वोक्ति आत्मा के परिचय से उसमें विश्राम पाने के लिए सदा उसकी भावना करना चाहिये, ऐसा कहते हैं। नीर-क्षीर के समान चिद्रूपता को प्राप्त हुए मन से ही चिन्मय आत्मा की भावना कर रहा जीव माया कौटिल्यरूप मालिन्य से रहित आत्मा में स्वयं प्रकाशित होता है यानी उसी रूप से स्वयं भासित होता है