Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
एकातपत्रमवनौ गुरुणोपदिष्टं सम्यक्सुपालय चिरं समयेह दृष्ट्या ।
राज्यं समस्तगुणरञ्जितराजलोकस्त्वाशो न युक्तइह कर्मसु नापि रागः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि तत्त्वज्ञ पुरुष असत्य वस्तु का अनुसरण नहीं करता है, तो राज्य आदि से मेरा क्या प्रयोजन
है, मेरे लिए तो सन्यास का ग्रहण कहना ही उचित है, इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी का आशय इंगित द्वारा
समझ कर कहते है।
पिताजी द्वारा प्रदत्त एकच्छत्र राज्य का अपने गुणों से राजा ओं ओर प्रजाओं को प्रसन्न कर आप
समान दृष्टि से चिरकाल तक पालन कीजिये । प्रारब्ध होने के कारण अवश्य भोगयोग्य कर्मो ओर उनके
फलों का न त्याग उचित है ओर न उनमें राग उचित हे