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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verse 41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

एकस्मिन्नेव सर्वस्मिन्परमात्मनि वस्तुनि । द्वितीया कल्पना नास्ति वह्नौ हिमकणा यथा ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

वास्तव में तो भान्ति का भी पथक्‌ निरूपण नहीं किया जा सकता, ब्रह्मैवेदं सर्वमात्मैवेदं सर्वम्‌“ इस श्रुति में कही गई रीति से यह सब ब्रह्म ही है, ऐसा कहते है। यह सब ब्रह्म ही है, इस प्रकार यह सब आत्मा ही फैला है। हे अनघ, मैं पृथक्‌ हूँ और जगत पृथक्‌ है, इस भ्रान्ति का आप परित्याग कीजिये । हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे सागर में सन्मय तरंगकल्पनाएँ नहीं हो सकती वैसे ही देशकृत परिच्छेद से शून्य, वस्तुकृत परिच्छेद से शून्य कालिक परिच्छेद से हीन आत्मा में कल्पनाएँ हो ही नहीं सकती हैं ॥३९.४०॥ वास्तविक एकत्व के विरोध से भी परमात्मा में द्वैत कल्पना नहीं हो सकती, ऐसा कहते है । जैसे अग्नि में हिमकण का अस्तित्व नहीं है, वैसे ही अद्वितीय सर्वात्मक परमात्मवस्तु में दूसरी कल्पना हे ही नहीं