Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
विश्वप्रपञ्चरचनेयमसत्यरूपा नासत्यरूपमनुधावति राम तज्ज्ञः ।
तज्ज्ञोऽसि शान्तकलनोऽसि निरामयोऽसि नित्योदितोऽसि भव सुन्दर शान्तशोकः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, यह सारी प्रपंच रचना असत्य है । यह असत्य है, ऐसा जाननेवाला तत्त्वज्ञ पुरुष
असत्य स्वरूप का अनुगमन नहीं करता हे । हे श्रीरामचन्द्रजी, आप तत्त्वज्ञानी हे, आपकी कल्पनाएँ
शान्त हो गई हे, आप दोषरहित, नित्यप्रकाश ओर शोकरहित होइये