Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verses 16–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
ततस्तस्योपदिष्टेन कृत्वा ध्यानार्चनादिकम् ।
क्रमेण पदमाप्नोति तद्यत्परमपावनम् ॥ १६ ॥
विचारेणावदातेन पश्यत्यात्मानमात्मना ।
इन्दुना शीतलेनान्तर्विश्वं खमिव तेजसा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त गुरु द्वारा उपदिष्ट मार्ग से पहले त्रिलोचन आदि सगुण परमेश्वर का ध्यान, भजन आदि
करके क्रमश: साधक पुरुष जो परम पावन पद है, उसे प्राप्त करता है। स्वच्छ विचार द्वारा अपने आत्मा
का शीतल चन्द्रमारूपी तेज से पूर्ण समस्त आकाश की तरह भीतर साक्षात्कार कीजिए