Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 45
चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतालीसवाँ सर्ग गाधि का भिलनी के गर्भ में जन्म, किरात स्थिति और कीरपुर में राज्य प्राप्ति का वर्णन ।
41 verse-groups
- Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इसके बाद जल के भीतर स्थित हुए गाधि ने मानसिक दु…
- Verse 3गर्भवास के दुःखों से वह पीडित था, उसके कोमल अंग थे ओर वह अपनी विष्टा के समान चाण्डाली के…
- Verse 4क्रमश: परिपक्व होने के कारण जैसे वर्षा ऋतु काले मेच को समय पर पैदा करती हे वैसे ही समय पर…
- Verse 5चाण्डालो के घर में उत्पन्न हुआ ओर चाण्डालो का अत्यन्त प्रिय शिशुरूप इधर-उधर चल रहा वह यमु…
- Verse 6विशालकाय, उदीयमान मेघ के समान था
- Verse 7शिकार खेलने के लिए कुत्तों से परिवृत होकर एक वन से दूसरे वन में विहार कर रहा, लाखों मृगों…
- Verses 8–9तदनन्तर तमाल की लता के समान चाण्डाल कन्या से उसने विवाह कर लिया था। वह स्तनरूप स्तवकां से…
- Verse 10जैसे काली भँवरी के साथ काला भौरा पुष्पों की समृद्धि से पूर्ण वनान्ता मे विहार करता है वैस…
- Verse 11वन की पर्णलताओं के (ताम्बूल लताओं के) पत्ते मे निवास कर रहा व्यसनं से आतुर वह पुरुष का आक…
- Verse 12वह वन के कुजं में विश्राम करता था, पर्वत की गुफाओं मेँ सोता था, पत्तों की ओट में छिपा रहत…
- Verse 13वह किंकिरात की मंजरियों के कर्ण भूषणो से अलंकृत रहता था, जूही की मालाओं से विभूषित रहता थ…
- Verse 14फूलों की सेजों पर लेटा रहता था, पर्वत के तटों पर घूमता था, वनों के विषय में असाधारण ज्ञान…
- Verse 15तदनन्तर जैसे खैर काँटों को पैदा करता है वैसे ही उसने वनों में अपने कुल के अंकुररूप पुत्रो…
- Verse 16पहले वह स्त्री- पुत्र आदि परिवारवाला हुआ, उसके वाद उसका यौवन क्षीण हो गया, तदनन्तर वृष्टि…
- Verse 17तदुपरान्त भूतमण्डल नामक देश की अपनी जन्मभूमि में जाकर दूर पर्णं कुटी बनाकर मुनीश्वर के सम…
- Verse 18वह जरा से अत्यन्त जर्जरता को प्राप्त हो गया । अपने शरीर के समान प्रमाणवाले उसके लड़के थे,…
- Verse 19वह बड़ प्रौढ था, चाण्डाल की गृहस्थी कर रहा था, उसके बहुत से बन्धु बान्धव थे, नाम, कर्म ओर…
- Verses 20–21तदनन्तर अन्य चाण्डालो से वृद्ध, अपने पूर्वोक्त भ्रम का अनुसरण कर रहे कुटुम्बी गाधि ने अपन…
- Verse 22दुःख से पीडित वह झुण्ड से बिछुड़े हुए मृग के समान एकाकी ही वन में रोता था । उसके नेत्र आँ…
- Verse 23शोक से व्याकुल बुद्धिवाले उसने कुछ दिन वहाँ बिताकर जैसे सूखे कमलवाले सरोवर का हंस आदि त्य…
- Verse 24अवलम्बनरहित ओर शोकपीडित वह किसी दूसरे के द्वारा प्रेरित हो रहे की नाई वायु से उडाये गये ब…
- Verse 25एक समय आकाश में सुन्दर विमान के समान आकाश में विचरण करनेवाला वह कीर लोगों के निवासभूत देश…
- Verses 26–27वह स्वर्ग मार्ग के तुल्य राजमार्ग के मध्य में पहुँचा जहाँ पर रत्नों ओर वस्त्रो से आच्छादि…
- Verse 28वहाँ पर उसने चलने से चंचल हुऐ सुमेरु पर्वत के, जिसमें श्रेष्ठ मणियों से देवताओं के मन्दिर…
- Verse 29जैसे रत्न परीक्षा में कुशल पुरुष चिन्तामणि को देखने की इच्छा से रत्न के लिए विहार करे वैस…
- Verse 30उस चाण्डाल ने कौतूहल से विस्फारित दृष्टि से स्पन्दयुक्त पर्वत के तुल्य उस हाथी को चिरकाल…
- Verse 31उस हाथी ने देख रहे उस चाण्डाल को अपनी सूँड़ से पकड़कर जैसे मेरू अपने तट पर सूर्य को संलग्…
- Verse 32जैसे प्रलयकाल के मेघ के आकाश में आरूढ होने पर सागर गरजते हैं वैसे ही उसके गण्डस्थलपर आरूढ…
- Verse 33मनोरथो को पूर्ण करनेवाला राजा सुशोभित हुआ | तदनन्तर जागे हुए पक्षियों की ध्वनि के समान रा…
- Verse 34इसके बाद सागरो की, जिनका जल तटों से टकराया हो, ध्वनि के समान बन्दिवृन्दों का तुमुल कोलाहल…
- Verse 35क्षीरसागर के मन्थन से जनित क्षोभ से घूम रही लहरियों ने जैसे मन्दराचल को परिवेष्टित किया थ…
- Verse 36जैसे वेलाएँ, जिनमें सूर्य नाना प्रकार के मणियों में प्रतिबिम्बित होने के कारण तत्-तत् प…
- Verses 37–38जैसे वृष्टियाँ जल प्रवाहो से वन मध्य में स्थित उत्तम शिखर को विभूषित करती हे वैसे ही हिम…
- Verse 39जैसे चंचल कररूपी पल्लववाली बसन्तशोभा वनको फूलों से वेष्टित करती है वैसे ही विचित्र वर्ण औ…
- Verse 40जैसे मेरु सन्ध्याकाल के मेघ, तारे, चन्द्रमा ओर आकाश गंगा से व्याप्त आकाश को ग्रहण करता है…
- Verse 41भाँति-भाँति के विलासों से युक्त ललनारूपी लताओं से परिवेष्टित ओर मणि और सुवर्ण के आभूषणों…
- Verse 42इस प्रकार के उसके पास जैसे फूले हुए मार्ग के वृक्ष के समीप पथिक जाते हैँ वैसे ही परिवार य…
- Verses 43–44उन्होने जैसे देवता ऐरावत हाथी पर इन्द्र का अभिषेक करते हैं वैसे ही उसी हाथी पर उसका सिंहा…
- Verses 45–46जैसे कौआ परिपुष्ट, प्राणविहीन जंगली हरिण को पाता है वैसे ही उस चाण्डाल ने कीरनगर के मध्य…
- Verse 47सन्तप्त हुआ हाथी जल के प्रवाहों से क्रीडा करता है वैसे ही सिंहों से विदीर्ण किये गये हाथि…
- Verse 48चारों ओर उसकी राज्यशक्ति व्याप्त थी, अतएव सब दिशाओं में उसकी आज्ञा चलती थी। कुछ दिनों में…