Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
नानावर्णरसामोदैस्तास्तमाशु विलेपनैः ।
अलेपयन्प्रभाजालैर्नगोऽभ्रमिव धातुभिः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चंचल कररूपी पल्लववाली बसन्तशोभा वनको फूलों से वेष्टित करती है वैसे ही
विचित्र वर्ण और सुगिन्ध वाले फूलों से सत्रियो ने उसे परिवेष्टित किया ॥ ३ ८॥ जैसे पर्वत मेरु आदिधातुओं
की प्रभाराशियों से मेघ को लिप्त करता है वैसे ही विविध रंग, रस और सुगन्धिवाले विलेपनों से उन्होने
शीघ्र उसका लेप किया