Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
परिविसृतनृपौजाः सर्वदिक्संस्थिताज्ञः कतिपयदिवसेहासिद्धदेशव्यवस्थः ।
प्रकृतिभिरलमूढाशेषराजन्यभारः स गवल इति नाम्ना तत्र राजा बभूव ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
चारों ओर उसकी राज्यशक्ति व्याप्त थी, अतएव सब दिशाओं में उसकी
आज्ञा चलती थी। कुछ दिनों में स्वेच्छा से ही उसकी सारी राज्यव्यवस्था सिद्ध हो गई थी प्रकृतियों ने
ही उसके समस्त अधीनस्थ राजाओं का भार वहन किया था, इस प्रकार का वह गवल इस नामसे
प्रसिद्ध होकर वहाँ पर राजा हुआ