Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verses 26–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, verses 26–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 26, 27
संस्कृत श्लोक
नृत्यद्रत्नांशुकच्छन्नमार्गवृक्षलताङ्गनम् ।
आगुल्फाकीर्णकुसुमं चन्दनागुरुसुन्दरम् ॥ २६ ॥
सामन्तैर्ललनाभिश्च नागरैश्च निरन्तरम् ।
स्वर्गमार्गोपमं राजमार्गमध्यमवाप सः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
वह स्वर्ग मार्ग के तुल्य राजमार्ग के
मध्य में पहुँचा जहाँ पर रत्नों ओर वस्त्रो से आच्छादित मार्ग स्थित वृक्ष, लताएँ ओर अंगनाएँ नाच रही
थी, टखनों तक फूल बिखरे हुए थे, अधीन राजाओं, ललनाओं और नागिरक लोगों से जो ठसाठस भरा
था और चन्दन तथा अगर से सुशोभित था