Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
अथापश्यदसौ गाधिर्यावत्तस्य कलत्रिणः ।
जरठः श्वपचेभ्यश्च स्वात्मनो भ्रमहारिणः ॥ २० ॥
तत्कलत्रमशेषेण नीतमावृत्य मृत्युना ।
आसारसलिलेनाशु वनपर्णगणो यथा ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर अन्य चाण्डालो से वृद्ध, अपने पूर्वोक्त भ्रम का अनुसरण कर रहे
कुटुम्बी गाधि ने अपना जितना कुटुम्ब था उसे मृत्यु द्वारा आवृत कर जैसे वृष्टि-जल का प्रवाह वन में
गिरे हुए सूखे पत्तों को ले जाता है वैसे ही गया देखा