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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथापश्यदसौ गाधिः स्वाधिपीवरया धिया । अन्तर्जलस्थ एवान्तरात्मनात्मनि निर्मले ॥ १ ॥ भूतमण्डलपर्यन्तग्रामोपान्तनिवासिनाम् । श्वपचानां स्त्रिया गर्भे स्थितिमात्मानमाकुलम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इसके बाद जल के भीतर स्थित हुए गाधि ने मानसिक दुःखों से भरी हुई अपनी बुद्धि से निर्मल आत्मा में अन्तरात्मा से अपने को भूतमण्डल नामक देश की सीमा के गाँव के नजदीक रहनेवाले चाण्डालो की रत्री के गर्भ मेँ स्थित अतएव आकुल देखा

सर्ग सन्दर्भ

चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतालीसवाँ सर्ग गाधि का भिलनी के गर्भ में जन्म, किरात स्थिति और कीरपुर में राज्य प्राप्ति का वर्णन ।