Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verses 45–46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 45,46
संस्कृत श्लोक
कीरीकरतलाम्भोजप्रमृष्टचरणाम्बुजः ।
सर्वाङ्गे कुङ्कुमालेपैः संध्याम्बुधरशोभनः ॥ ४५ ॥
जज्वाल कीरनगरे नागरीगणवानसौ ।
सिंहीगणयुतः सिंहो यथा कुसुमिते वने ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे कौआ परिपुष्ट, प्राणविहीन जंगली हरिण को पाता है वैसे ही उस चाण्डाल ने
कीरनगर के मध्य में इस प्रकार राज्य प्राप्त किया ॥ ४ ४॥ कीरदेश की नारियों के करकमलों से जिसके
चरण दबाये जाते थे, सवांग में कुंकुम के लेप से जो सन्ध्याकाल के समान सुन्दर था, इस प्रकार का वह
नागरिक ललना जनों से युक्त होकर जैसे फूले हुए वन में सिंहिनियों के झुण्ड से युक्त सिंह सुशोभित
होता है वैसे ही कीरनगर में सुशोभित हुआ