Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
रत्नकाञ्चनकान्तोऽसावाददे चित्तमाततम् ।
संध्याभ्रतारेन्दुनदीव्याप्तं मेरुरिवाम्बरम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मेरु सन्ध्याकाल के मेघ, तारे, चन्द्रमा ओर आकाश गंगा से व्याप्त
आकाश को ग्रहण करता है वैसे ही रत्न ओर सुवर्ण के भूषणो से भूषित उसने उनके हर चित्त को हर
लिया