Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 24
तेईसर्वौँ सर्ग समाप्त चौबीसवाँ सर्म राजा के दर्शन में उपायभूत वैराग्य आदि के साथ उस दुष्ट मन्त्री पर विजय प्राप्ति के उपाय का वर्णन ।
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- Verses 1–2बलि ने कहा : हे तात, उस बलवान मन्त्री पर किस उपाय से विजय प्राप्त की जा सकती हे तथा महाबल…
- Verses 3–11का साक्षात्कार नहीं होता । राजा का साक्षात्कार न होने पर वह दुष्ट मन्त्री अत्यन्त दुःख के…
- Verse 12अब गूढोक्ति का विवरण करते है । हे पुत्र कौन वह देश है, यह सब में तुमसे प्रकट करता हूँ, सु…
- Verses 13–15हे महामते, वहाँ पर मनुष्य आदि के आनन्द से लेकर हिरण्यगर्भ के आनन्दपर्यन्त सम्पूर्ण पदों क…
- Verses 16–18बलि ने कहा : हे भगवन्, उस चित्त की विजय में जो युक्ति हो, उसे आप स्पष्ट रूप से कहिये, जि…
- Verse 19विरोचन ने कहा : हे पुत्र, सभी विषयों के प्रति जो यह अत्यन्त अस्पृहा है, वही मन की विजय के…
- Verse 20हे पुत्र, इन विषयों मे विरक्ति का यदि क्रम से अभ्यास किया जाय, तो यह जैसे सेक से सींची गई…
- Verses 21–24हे पुत्र, जैसे बोये बिना धान नहीं मिलते वैसे ही यदि विरक्ति का अभ्यास न किया जाय, तो भोगो…
- Verse 25वैराग्य की दृढ़ता में हर्ष, क्रोध, चंचलता आदि की प्राप्ति का निवारण करनेवाली पौरुष दढता आ…
- Verses 26–29यदि कोई कहे दैव से ही उसकी प्राप्ति क्यो न हो जायेगी ? तो इस पर कहते हैं। यद्यपि संसार मे…
- Verses 30–31यदि दैवनामक नियति पौरुषनामक नियति से जीती जाती है, तो नियति के फल में नियम न होने के कारण…
- Verse 32हमारे मत में कर्ता भी मन ही है, वह यहाँ पर जिस वस्तु की जैसी कल्पना करता है, वह वैसे ही ह…
- Verse 33इसलिए वस्तु के पारमार्थिक होने पर तद्विषयक बोध में नियत फलता ही है। दैव के अथवा कर्म के स…
- Verse 34कभी (उत्थानकाल मेँ) शास्त्ररूप नियम से विहित वर्णाश्रमोचित कर्म करता हुआ, अज्ञानी लोगों क…
- Verse 35इसलिए जब तक मन हे, तब तक न दैव है न नियति है । मन के अस्त होने पर जो होता है, वह वैसे ही…
- Verse 36पुरुष कर्म और ज्ञान के अधिकारी शरीर को प्राप्त होकर पौरुष से जिस पदार्थ का जैसे संकल्प कर…
- Verses 37–41संकल्प के स्वाधीन होने पर पौरुष द्वारा वैराग्य आदि साधनों का सम्पादन कर परम पुरुषार्थरूप…
- Verse 42बलि ने कहा : हे सब असुरों के अधिपति, नित्यात्मभावरूप स्थिति देनेवाली भोगों में अरति ही जी…
- Verse 43जैसे लक्ष्मी कमल के अंदर निवास करती है, वैसे ही यह विषयों में उत्तम अरति आत्म- साक्षात्का…
- Verse 44इसलिए पुरुष प्रज्ञारूप मणि की कसौटी, अति उत्तम विचार से परब्रह्म परमात्मा का दर्शन करे और…
- Verses 45–46चित्त के परिपाक के अनुसार भूमिका भेदों के कहने की इच्छावाले विरोचन पहली भूमिका कहते हैं ।…
- Verse 47प्रथम भूमिका पर विजय प्राप्त होने के अनन्तर उसके आगे की भूमिका कहते हैं। कुछ व्युत्पत्तिय…
- Verse 48पूर्वोक्त चारों प्रकार के क्रमों में शुद्ध चित्त पुरुष ही अधिकारी है, ऐसा कहते हैं। साधुत…
- Verses 49–50थोड़े मलिन चित्त का ज्ञान कथा क्रम में कैसे अधिकार है ? इस पर कहते हैं। दुःख के अन्वय-व्य…
- Verse 51जिसमें भेद से विषमतारूप कुटिलता नहीं रह गई, ऐसी सरल उत्कृष्ट प्रज्ञा से वह इन्द्रिय, विषय…
- Verse 52विचार का फल तृष्णा का आत्यन्तिक त्याग भी तभी होता है, इस आशय से कहते हैं। हे पुत्र प्रज्ञ…
- Verses 53–54विचार का फल पुरुष अपराधनिवृत्ति और ज्ञान का फल मूल अविद्यानिवृत्ति पृथक् सिद्ध नहीं होते…
- Verses 55–64शरत्काल उत्पन्न होता है
- Verses 65–66भोगों की निंदा से विचार उत्पन्न होता है और विचार से भोगों की निंदा उत्पन्न होती हे, ये दो…
- Verse 67तदनन्तर विचार होता है, विचार के बाद विचाररहित वाक्यार्थ का ज्ञान होता है । उसके बाद गति स…
- Verses 68–69विषयों का त्याग करने मेँ यदि इस समय असमर्थ हो, तो यौवन आदिकाल के बीतने पर जब विषयों से वि…
- Verse 70हे शुद्ध तुम्हारी आस्था भोगों में स्थित भी नहीं हे, जिससे कि तुम्हें अन्य काल की प्रतीक्ष…
- Verse 71पूर्वोक्त अर्थ का संक्षेप कर उपसंहार करते हैं। देश और आचार से अविरुद्ध क्रम से धन का उपार…