Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
स्फुरत्यस्मिञ्जगत्कोशे जीवो व्योम्नीव मारुतः ।
नियत्या विहितं कुर्वन्कदाचिन्नियतिं चरः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए वस्तु के पारमार्थिक होने पर तद्विषयक बोध में नियत फलता ही है। दैव के अथवा कर्म के
समान नियतफलता नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
यह चित्तरूप जीव कभी (मोक्षाधिकारी जन्म में) नित्य नियत एक स्वभाववाले परमात्मा में प्रत्यक्
परमार्थ विषयक साक्षात्कार नामक निर्विकल्प समाधि करता हुआ जैसे वायु आकाश में स्फुरित होता
है, वैसे ही इस जगत्कोश में स्फुरित होता है यानी स्वस्वभाव में प्रकाशित होता है