Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verses 49–50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, verses 49–50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 49,50
संस्कृत श्लोक
शनैः शनैर्लालनीयं युक्तिभिः पावनोक्तिभिः ।
शास्त्रार्थपरिणामेन पालयेच्चित्तबालकम् ॥ ४९ ॥
परे परिणतं ज्ञाने शिथिलीभूतदुर्ग्रहम् ।
ज्योत्स्नाऽहीनस्फटिकवच्चेतः शीतं विराजते ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
थोड़े मलिन चित्त का ज्ञान कथा क्रम में कैसे अधिकार है ? इस पर कहते हैं।
दुःख के अन्वय-व्यतिरेक के प्रदर्शन और पवित्र श्रुति, स्मृति और गुरू के वचनों से धीरे-धीरे
चित्त का लालन करना चाहिये । शास्त्रार्थ मेँ चित्त के चिरपरिशीलन द्वारा आँवले के मुरब्बे के समान
मधुरैकरसता के परिणाम से चित्त का पालन करना चाहिये | परम ज्ञान में परिणत हुआ चित्त, जिसका
बाह्य मलिन जड़ाकारग्रहण शिथिल हो गया हो वह चाँदनी से युक्त स्फटिक के समान शीतल हो कर
विराजमान होता है