Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verses 37–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, verses 37–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 37-40
संस्कृत श्लोक
परं पौरुषमाश्रित्य भोगेष्वरतिमाहरेत् ।
न भोगेष्वरतिर्यावज्जायते भवनाशनी ॥ ३७ ॥
न परा निर्वृतिस्तावत्प्राप्यते जयदायिनी ।
विषयेषु रतिर्यावत्स्थिता संमोहकारिणी ॥ ३८ ॥
तावद्भवदशादोला विलोलान्दोलनस्थितिः ।
अभ्यासेन विना पुत्र न कदाचन दुःखदा ॥ ३९ ॥
भोगभोगिभरप्रोता कदाशा विनिवर्तते ॥ ४० ॥
बलिरुवाच भोगेष्वरतिरेवान्तः कथं सर्वासुरेश्वर ।
स्थितिमायाति जीवस्य दीर्घजीवितदायिनी ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
संकल्प के स्वाधीन होने पर पौरुष द्वारा वैराग्य आदि साधनों का सम्पादन कर परम पुरुषार्थरूप
ब्रह्मात्मभाव का ही संकल्प करना चाहिये, देहात्मभाव का संकल्प नहीं करना चाहिये, इस अभिप्राय से
कहते हैं।
हे पुत्र, पुरुषार्थ के सिवाय यहाँ पर कुछ भी नहीं है, इसलिए पुरुष परम पौरुष का अवलम्बन कर
भोगों के प्रति वैराग्य करे जब तक संसार का विनाश करनेवाली भोगों में विरक्ति नहीं होती, तब तक
विजय देनेवाली परम विश्रान्ति प्राप्त नहीं होती । जब तक मोह में डालनेवाली विषयों में रति रहती है,
तब तक संसार दशारूपी झूला चंचल आन्दोलनवाला रहता हे हे पुत्र आभ्यास के बिना भोगरूपी
साँपों के समूहों से भरी हुई दुःखदायिनी दुराशा कभी निवृत्त नहीं होती